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भारत का स्वर्ण युग

Elizabeth Diffin

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बड़ी आबादी जीवन बीमा उद्योग में बड़े पैमाने पर अवसर प्रदान करती है।

जब आप इस बात पर ध्यान देते हैं कि भारत में पहली बीमा कंपनी की स्थापना 200 साल पहले हुई थी, तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि जीवन बीमा की पहुँच बहुत ही कम 2.76 प्रतिशत पर बनी हुई है। लेकिन देश की 1.4 बिलियन की व्यापक आबादी का अर्थ है कि इतना कम प्रतिशत भी 360 मिलियन जीवन बीमा पॉलिसियों को बनाता है। वास्तव में, भारत का जीवन बीमा क्षेत्र दुनिया में सबसे बड़ा है, और यहां से यह केवल आगे की ओर ही बढ़ेगा।

मुंबईकी 18 वर्षों से MDRT सदस्य प्रीति अजीत कुचेरिया, LUTCF, CFP, ने कहा, “इसमें बड़े पैमाने पर विकास की संभावनाएं हैं, जो पिछले एक दशक में तेजी से सामने आई हैं।" “यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय बीमा क्षेत्र अपने स्वर्णकाल में है।"

यह काल 21वीं सदी में शुरू हुआ, जब बीमा क्षेत्र के दरवाजे निजीकरण के लिए खोले गए। इससे पहले, यह कार्य विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (एलआईसी) द्वारा किया जाता था। आज, भारत में 24 जीवन बीमा और 31 सामान्य बीमा कंपनियां हैं। उद्योग के 2020 तक $280 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है।

हरियाणा के 14 वर्षों से MDRT सदस्य रवि पहलराज राजपाल ने कहा, "साल 2000 की शुरुआत से, एक लाख से अधिक व्यक्तिगत वित्तीय सलाहकार (IFA) और लगभग 1,000 बड़े वित्तीय संस्थान पूरे देश में तेजी से फैले।" "यूएसए और यूके की तुलना में भारत के पास जीवन बीमा व्यवसाय के विकास की ज्यादा संभावनाएं हैं।"

सलाहकारों का मानना है कि उस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा भारतीय आबादी के बीच जागरुकता पैदा कर रहा है।

कोलकाता के पांच वर्षों से MDRT सदस्य सुकांता सिंहा रॉय, CFC, FSS ने कहा, "ग्राहकों को अच्छी शिक्षा चाहिए।"

कुचेरिया भी मानती हैं कि बीमा क्या है और इसका क्या उपयोग किया जा सकता है, इस बात की समझ वृद्धि में सहायक हो सकती है।

उन्होंने कहा, “पहले लगभग सभी लोग केवल टैक्स बचाने के लिए बीमा उत्पाद खरीदते थे, और उनके द्वारा भुगतान किए जाने वाले प्रीमियम की राशि इस बात पर निर्भर करती थी कि उन्हें कितनी टैक्स छूट मिल रही है।" “अब बीमा ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। लोग सही कारणों से खरीदते हैं – जल्दी मृत्यु हो जाने या वृद्धावस्था से जुड़े जोखिमों को कवर करने के लिए।”

निजी बीमा कंपनियों के आगमन से भी इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, जिससे ग्राहकों की ज़रूरतों पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। राजपाल ने कहा कि वह ग्राहक के साथ विश्वास निर्मित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी अनुशंसाएं ग्राहकों की ज़रूरतों को पूरा करती हैं, वह फैक्ट-फाइंडिंग पर ध्यान देना नहीं भूलते। इसके अलावा, उनका मानना है कि यह मानवीय स्पर्श ऐसे समय में ग्राहकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जब वे ऑनलाइन उत्पाद खरीद सकते हैं।

मुंबई की छह वर्षों से MDRT सदस्य, प्लाबिता प्रियदर्शी ने कहा, "ग्राहकों के साथ मुझे जिन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनमें से एक है उत्पाद के बारे में निर्णय लेना।" “ग्राहकों के पास विभिन्न विकल्प हैं और कई कंपनियां उनसे संपर्क करती हैं, इसलिए ग्राहक निर्णय लेने में समय लेते हैं और कभी-कभी खरीदने से इंकार करते हैं। इससे निपटने के लिए, मैं हमेशा उनके वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक की जांच करके विश्लेषण करती हूं और फिर एक उचित समाधान सुझाती हूं।”

रॉय बताते हैं कि "हमारे ग्राहकों की सफलता यानी हमारी सफलता," इसलिए सलाहकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके ग्राहकों का वित्तीय स्वास्थ्य अच्छा है और जो उत्पाद उन्हें दिया गया है, वो उनकी ज़रूरतों की पूरा करता है।

जबकि कई स्थानों पर नियमों को प्रतिबंधात्मक या फिर अवरोधक के रूप में देखा जाता है, भारतीय सलाहकारों का मानना है कि वे वास्तव में ग्राहक की भलाई पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इंश्योरेंस रेग्युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आईआरडीए) ग्राहकों के हित में काम करते हुए पूरे देश में बीमा क्षेत्र पर नज़र रखता है। वास्तव में, प्रियदर्शी थोड़ा आगे बढ़कर कहती हैं कि "सब कुछ ग्राहक के पक्ष में है।"

भारत के पास जीवन बीमा क्षेत्र में विकास की काफी संभावना है।
— रवि पहलराज राजपाल

उदाहरण के लिए, कुचेरिया एक नियम का हवाला देती हैं, जिसके तहत सभी जीवन बीमा कंपनियों को सभी यूनिट-लिंक्ड बीमा पॉलिसियों के लिए एक लाभ चित्रण प्रदान करना ज़रूरी है। यह चित्रण दो मानक विकास दर परिदृश्यों (8 प्रतिशत और 4 प्रतिशत) और शुद्ध लाभ की तुलना करता है, जिससे ग्राहकों के लिए योजनाओं पर पूरी तरह से विचार करना और एक समझदार निर्णय लेना आसान हो जाता है।

हाल के वर्षों में, कमीशन भुगतान में कमी आई है, इसके साथ ही कमीशन के अनिवार्य प्रकटीकरण के चलते सलाहकारों और उनके ग्राहकों के बीच अधिक पारदर्शिता देखने को मिली है।

राजपाल ने कहा कि, शायद हमारी सोच के विपरीत, कमीशन का प्रकटीकरण वास्तव में उनके काम को आसान बनाता है।

उन्होंने कहा, “जीवन बीमा कंपनी चित्रण और पॉलिसी दस्तावेज़ में यह सब डेटा प्रिंट करती है, इसलिए कोई अस्पष्टता नहीं है।” "ग्राहक सलाहकार और जीवन बीमा कंपनी द्वारा दी जाने वाली सेवाओं की लागत को जानते हैं।"

इसी तरह, कुचेरिया ने कहा कि अनिवार्य प्रकटीकरण वास्तव में सलाहकारों के लिए ग्राहकों के समक्ष खुद को बेहतर वित्तीय स्थिति वाले व्यक्ति के रूप में पेश करने में सहायक हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, “यह कई बार क्लाइंट प्रेजेंटेशन के दौरान चर्चा का बिंदु बन जाता है।” “सलाहकार के रूप में, आप बातचीत के वक़्त कमीशन के रूप में प्राप्त मूल्य को रेखांकित करना सीखते हैं। जब कमीशन के ढांचे को नीचे की ओर या विपरीत दिशा में संशोधित किया जाता है, तो यह अंततः शुल्क लेने के लिए आधार बनाने में भी सहायक होगा।

इसके अलावा, आईआरडीए पर्सिस्टेंसी रेश्यो की निगरानी करता है, जिसके तहत सलाहकारों को यह बताना होता है कि पहले पॉलिसी वर्ष और पांचवें पॉलिसी वर्ष के बाद उनकी जीवन बीमा पॉलिसियों में से कितनी चालू हैं।

राजपाल ने कहा, “यदि कोई सलाहकार पर्सिस्टेंसी को नज़रंदाज़ करता है, तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। "इससे ग्राहकों को केवल समर्पित सलाहकार मिलते हैं, जो जीवन बीमा व्यवसाय से हमेशा जुड़े रहने का वादा करते हैं।"

यद्यपि भारत में पर्सिस्टेंसी रेश्यो में सुधार होने लगा है - 2017 में पहले पॉलिसी वर्ष के लिए 65 प्रतिशत प्रतिधारण, जो 2016 में 61 प्रतिशत था – इसके बावजूद वह अभी भी वैश्विक औसत से काफी पीछे है, जो लगभग 90 प्रतिशत है।

इसलिए नियामक बीमा बेचने के लिए बेसिक सर्टिफिकेशन शुरू करके और लिखित परीक्षा और लाइसेंस अनिवार्य बनाकर अपने देश के सलाहकारों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं। कुचेरिया का मानना है कि इससे वित्तीय सलाहकारों की प्रतिष्ठा में भी इजाफा हुआ है, अब वह केवल “उत्पाद बेचने वाले” से सम्मानित पेशेवर बन गए हैं।

और भविष्य में, ये उद्यमी सलाहकार चुनौतियों का सामना करते हुए नए अवसर खोजने में भी सक्षम होंगे। रॉय का मानना है कि ऐसे बहुत से अप्रयुक्त मार्केट सेगमेंट हैं, जिन्हें एक्सप्लोर किया सकता है, खासकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्र।

इसमें विकास के लिए व्यापक क्षमता है, जो तेजी से हो रहा है।
— प्रीति अजीत कुचेरिया

उन्होंने कहा, “एलआईसी के लिए व्यवसाय का एक बड़ा हिस्सा इन क्षेत्रों से आता है।" "लेकिन इस सेगमेंट तक पहुंचने में कठिनाइयाँ हैं, जो हमें वापस ग्राहक शिक्षा के मुद्दों पर ले जाएंगी।"

किसी भी देश में, ग्राहक प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित रहता है। राजपाल अक्सर उस सलाह पर वापस आते हैं, जो उन्हें दिवंगत MDRT सदस्य बेन फेल्डमैन से मिली थी, वो उसे अपना मूलमंत्र मानते हैं: “नंबर 1: लोगों से मिलें। नंबर 2: ज्यादा लोगों से मिलें। नंबर 3: ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलें।”

इसका मतलब है कि वह खुद को कुछ हद तक अवसरवादी मानते हैं, जो हर परिचय, रेफरल या अचानक होने वाली मुलाकातों का लाभ उठाता है।

प्रियदर्शी ने इसी तरह अपने सबसे यादगार ग्राहकों में से एक को बीमा खरीदने के लिए तैयार किया। दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन से मुंबई की यात्रा के दौरान, वह हवाई अड्डे के लाउंज में एक पिता और बेटी से मिलीं, जो लंबी उड़ान के दौरान उनके नज़दीक ही बैठे थे। प्रियदर्शी ने उन्हें अपने पेशे के बारे में बताया और उनसे मुलाकात के लिए समय मांगा, जो अंततः एक लाभदायक ग्राहक-सलाहकार संबंध में परिवर्तित हो गया।

उन्होंने कहा, “हम सभी में किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की क्षमता होनी चाहिए।” “ग्राहक हमें हर जगह मिल सकते हैं; बस पहला कदम उठाने की ज़रूरत है।”

संपर्क

प्रीति अजीत कुचेरिया priti@kucheria.co.in

प्लाबिता प्रियदर्शी ने plabis2003@yahoo.co.in

रवि पहलराज राजपाल amit.vashist@maxlifeinsurance.com

सुकांता सिंहा रॉय sukantasingharoy@hotmail.com

 

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